Friday, 28 December 2012

मेरी कविता(स्मृतियाँ शेष है)

मेरी कविता(स्मृतियाँ शेष है)

मेरे शब्द खो रहे हैं आज, मेरी ही कविताओं से। 
जैसे सुंदरता खो रही हो, संगमरमरी प्रतिमाओं से॥ 

अब न छंद है, न रस है, न है उपमा और अलंकार। 
इनके बिना तो, मेरी कविता हो जाएगी निराकार॥ 

कल्पना की बातें, अब तो बस कल्पना रह जाएगी। 
सादे कागजो पर, हक़ीक़त बनकर न ये उतार पाएगी॥ 

फिर तो मायूस होकर मैं, सदा के लिए गुमनाम हो जाऊंगा। 
न जाने किस अंधेरी गर्त मे, परछाई की तरह खो जाऊंगा॥ 

शैलेश कुमार बरमाटे 
(दिनाँक 25/08/2002)


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