मेरी कविता(स्मृतियाँ शेष है)
मेरे शब्द खो रहे हैं आज, मेरी ही कविताओं से।
जैसे सुंदरता खो रही हो, संगमरमरी प्रतिमाओं से॥
अब न छंद है, न रस है, न है उपमा और अलंकार।
इनके बिना तो, मेरी कविता हो जाएगी निराकार॥
कल्पना की बातें, अब तो बस कल्पना रह जाएगी।
सादे कागजो पर, हक़ीक़त बनकर न ये उतार पाएगी॥
फिर तो मायूस होकर मैं, सदा के लिए गुमनाम हो जाऊंगा।
न जाने किस अंधेरी गर्त मे, परछाई की तरह खो जाऊंगा॥
शैलेश कुमार बरमाटे
(दिनाँक 25/08/2002)
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